MMMUT में साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण, AI और LLM से पैदा हो रहे नए खतरों पर रहेगा फोकस

गोरखपुर स्थित मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (MMMUT) में साइबर सुरक्षा और डिजिटल फॉरेंसिक्स को लेकर एक सप्ताह का संकाय विकास कार्यक्रम शुरू किया गया है। प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षकों और विशेषज्ञों को साइबर अपराध की जांच, डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण और आधुनिक साइबर खतरों से निपटने की तकनीकों से परिचित कराना है।
यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग और साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर की ओर से आयोजित किया जा रहा है। इसमें गोरखपुर स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (NIELIT) का सहयोग भी लिया जा रहा है। कार्यक्रम का आयोजन केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के Information Security Education and Awareness (ISEA) Project-Phase III के तहत किया जा रहा है।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 21 से 25 सितंबर तक चलेगा।
साइबर अपराध से निपटने के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत
कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ साइबर अपराध के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। डेटा चोरी, ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड, वित्तीय धोखाधड़ी, फिशिंग और विभिन्न प्रकार के साइबर स्कैम लोगों और संस्थानों के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
उन्होंने कहा कि बदलते साइबर खतरों का प्रभावी तरीके से मुकाबला करने के लिए तकनीकी रूप से दक्ष और प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना जरूरी है।
प्रतिभागियों से विश्वविद्यालय में मौजूद साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर की आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करने की अपील की गई। साथ ही प्रशिक्षण के दौरान हासिल जानकारी को पढ़ाई, रिसर्च और नई तकनीकों के विकास के साथ वास्तविक साइबर अपराधों की जांच में उपयोग करने पर जोर दिया गया।
डिजिटल अरेस्ट और AI फ्रॉड पर भी चर्चा
कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग की ओर से बताया गया कि मौजूदा समय में डिजिटल अरेस्ट स्कैम, AI आधारित धोखाधड़ी, ऑनलाइन फ्रॉड, साइबर स्टॉकिंग, सोशल मीडिया अपराध और पहचान की चोरी जैसी घटनाएं लगातार नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।
साइबर अपराध की जांच में डिजिटल फॉरेंसिक्स की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। किसी मोबाइल, कंप्यूटर या अन्य डिजिटल डिवाइस से मिले साक्ष्यों को सुरक्षित रखना, उनकी जांच करना और वैज्ञानिक तरीके से उनका विश्लेषण करना जांच प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
नेटवर्क सिक्योरिटी से लेकर AI थ्रेट्स तक प्रशिक्षण
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को साइबर सिक्योरिटी के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी जाएगी। इसमें नेटवर्क सिक्योरिटी, क्रिप्टोग्राफी, एन्क्रिप्शन, डिजिटल सिग्नेचर और नेटवर्क स्कैनिंग जैसे विषय शामिल हैं।
इसके अलावा वेब सिक्योरिटी, क्लाउड सिक्योरिटी और सिक्योरिटी टेस्टिंग से जुड़ी तकनीकों पर भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कार्यक्रम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) से जुड़े संभावित साइबर खतरों पर भी विशेष चर्चा की जा रही है।
प्रतिभागियों को साइबर सिक्योरिटी मॉनिटरिंग और साइबर अपराधों की जांच से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी भी दी जा रही है।
डिजिटल साक्ष्यों की जांच का मिलेगा हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डिजिटल फॉरेंसिक्स से जुड़े आधुनिक टूल्स का व्यावहारिक प्रशिक्षण है। प्रतिभागियों को विभिन्न डिजिटल उपकरणों से साक्ष्य जुटाने और उनका विश्लेषण करने की प्रक्रिया समझाई जा रही है।
इस दौरान डिस्क और फाइल सिस्टम फॉरेंसिक्स, मोबाइल फॉरेंसिक्स, पासवर्ड रिकवरी, डिक्रिप्शन और ऑडियो-वीडियो फॉरेंसिक्स जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
इसके साथ ही स्टेगनोग्राफी, नेटवर्क फॉरेंसिक्स, क्रिप्टोकरेंसी फॉरेंसिक्स, ड्रोन फॉरेंसिक्स और सोशल मीडिया फॉरेंसिक्स की तकनीकों पर भी जानकारी दी जाएगी।
प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को डिजिटल साक्ष्यों की पहचान, संरक्षण और वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए व्यावहारिक रूप से सक्षम बनाना है।
58 प्रतिभागी ले रहे हैं प्रशिक्षण
कार्यक्रम के समन्वयकों के अनुसार, इस संकाय विकास कार्यक्रम में कुल 58 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। प्रशिक्षण के जरिए साइबर सुरक्षा और डिजिटल फॉरेंसिक्स के क्षेत्र में उनकी तकनीकी एवं व्यावहारिक क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
इसके अलावा प्रतिभागियों को साइबर सुरक्षा से जुड़ी नई तकनीकों को शिक्षण, शोध और नवाचार के साथ जोड़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
