देश में घटे 17 हजार से अधिक सरकारी स्कूल, संसद में सरकार ने पेश किए चौंकाने वाले आंकड़े

देश में सरकारी स्कूलों की संख्या को लेकर संसद में पेश किए गए आंकड़ों ने नई बहस को जन्म दिया है। लोकसभा में सरकार ने बताया कि पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में 17 हजार से अधिक की कमी दर्ज की गई है। हालांकि सरकार का कहना है कि स्कूल खोलने, बंद करने या उनका विलय करने का अधिकार राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास है।
सरकार के अनुसार, वर्ष 2021-22 में देशभर में 10,22,386 सरकारी स्कूल थे, जबकि 2025-26 तक यह संख्या घटकर 10,05,245 रह गई। यानी इस अवधि में कुल 17,141 सरकारी स्कूलों की कमी दर्ज की गई।
स्कूलों की संख्या क्यों घटी?
सरकार ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत स्कूलों का विलय केवल आवश्यक परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग, शिक्षण व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना और स्कूल कॉम्प्लेक्स या क्लस्टर मॉडल को बढ़ावा देना है। साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी निर्णय से छात्रों की पढ़ाई या स्कूल तक पहुंच प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा कमी?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई, जहां सरकारी स्कूलों की संख्या 23,173 से घटकर 18,787 रह गई। इसके अलावा महाराष्ट्र, असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में भी स्कूलों की संख्या में कमी आई।
अन्य राज्यों में भी गिरावट दर्ज की गई, जिनमें शामिल हैं:
- मेघालय: 7,783 से घटकर 5,620
- तेलंगाना: 30,023 से 28,088
- पश्चिम बंगाल: 83,302 से 81,591
- मध्य प्रदेश: 92,695 से 91,199
- कर्नाटक: 49,679 से 48,527
किन राज्यों में बढ़ी संख्या?
कुछ राज्यों में सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ी भी है। राजस्थान में स्कूलों की संख्या 68,948 से बढ़कर 69,983 हो गई, जबकि बिहार में यह 75,558 से बढ़कर 76,435 पहुंच गई। छत्तीसगढ़ और गुजरात में भी हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
उत्तर प्रदेश की स्थिति
उत्तर प्रदेश में कुल सरकारी स्कूलों की संख्या लगभग स्थिर रही। वर्ष 2021-22 में राज्य में 1,37,024 सरकारी स्कूल थे, जो 2025-26 में बढ़कर 1,37,103 हो गए। हालांकि जिलेवार आंकड़ों में कुछ स्थानों पर कमी देखने को मिली।
- गाजियाबाद: 504 से 474
- अलीगढ़: 2,167 से 2,114
- झांसी: 1,504 से 1,450
- हाथरस: 1,285 से 1,268
इसके अलावा फिरोजाबाद, प्रयागराज और जालौन में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई।
लड़कियों की शिक्षा पर क्या असर?
सरकार ने लड़कियों के नामांकन और स्कूल में बने रहने से जुड़े आंकड़े भी साझा किए। कक्षा 3 से 5 तक लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात 97 से घटकर 93.5 हो गया, जबकि कक्षा 6 से 8 में यह 92.5 से 92.3 पर आ गया। वहीं कक्षा 9 से 12 के स्तर पर यह अनुपात 70.5 से बढ़कर 74 हो गया।
प्राथमिक स्तर पर छात्राओं के स्कूल में बने रहने की दर 93.4 से घटकर 92.2 रही, जबकि उच्च माध्यमिक स्तर पर यह 49.6 से बढ़कर 55 प्रतिशत तक पहुंच गई।
सरकार ने क्या कहा?
सरकार ने बताया कि समग्र शिक्षा योजना के तहत राज्यों को नए स्कूल, अतिरिक्त कक्षाओं का निर्माण, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों का संचालन, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन सहायता और स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है। शिक्षक-छात्र अनुपात बेहतर बनाए रखने के लिए भी केंद्र राज्यों को सहयोग दे रहा है, जबकि शिक्षकों की भर्ती और तैनाती की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है।
कई सवाल अब भी बाकी
हालांकि संसद में कुल सरकारी स्कूलों की संख्या का आंकड़ा साझा किया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पांच वर्षों में कितने स्कूल पूरी तरह बंद हुए, कितनों का अन्य स्कूलों में विलय किया गया और कितने नए स्कूल शुरू किए गए। इसी तरह यह भी साफ नहीं किया गया कि स्कूलों के विलय से छात्रों की पढ़ाई, दाखिले या स्कूल तक पहुंच पर क्या प्रभाव पड़ा।
ऐसे में आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि देश में सरकारी स्कूलों की संख्या घटी है, लेकिन इसके पीछे के कारणों और वास्तविक प्रभाव की पूरी तस्वीर अभी सामने आना बाकी है।
