संघ प्रमुख ने गोरखपुर में कुटुंब स्नेह मिलन के दौरान कहा, “संस्कारहीन परिवारों में मतांतरण की घटनाएं बढ़ सकती हैं”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सोमवार (16 फरवरी 2026) को गोरखपुर में आयोजित ‘कुटुंब स्नेह मिलन’ कार्यक्रम को संबोधित किया। रामगढ़ताल स्थित बाबा गंभीरनाथ ऑडिटोरियम में उन्होंने परिवार व्यवस्था, संस्कार और सामाजिक संरचना पर विस्तार से विचार रखे।


कुटुंब ही सामाजिक शिक्षा का केंद्र

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की विशेषता उसका ‘कुटुंब’ है, जबकि पश्चिमी देशों में संबंध अक्सर “सौदे” जैसे हो गए हैं। उनके अनुसार, भारत में परिवार सामाजिक शिक्षा, आर्थिक गतिविधि और संस्कृति के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण का केंद्र है।

उन्होंने कहा कि कुटुंब का केंद्र माता होती है, जो आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करती है। “हमारे यहां व्यक्ति से बड़ा परिवार है, जबकि विदेशों में व्यक्ति परिवार से बड़ा हो गया है,” उन्होंने कहा।


‘संस्कार नहीं होंगे तो मतांतरण होगा’

संघ प्रमुख ने कहा कि विवाह भारत में कर्तव्य है, करार नहीं। परिवार में ही त्याग, अनुशासन और राष्ट्रभाव का संस्कार सिखाया जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि घर में संस्कार नहीं होंगे तो मतांतरण जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।


संघ और कुटुंब का संबंध

भागवत ने कहा कि संघ की मजबूती के पीछे स्वयंसेवकों के परिवारों का सहयोग है। उन्होंने उदाहरण देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का उल्लेख किया और कहा कि जब राष्ट्र के लिए त्याग की अपील की गई तो लोगों ने परिवार के स्तर पर योगदान दिया।

उन्होंने कहा, “कुटुंब का साथ नहीं मिलता तो संघ खड़ा नहीं होता।”


छोटे स्तर पर कुटुंब मिलन का आह्वान

संघ प्रमुख ने सुझाव दिया कि वर्ष में दो-तीन बार छोटे स्तर पर कुटुंब मिलन कार्यक्रम होने चाहिए। परिवार में रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और अतिथि-सत्कार जैसी मूल आवश्यकताओं पर ध्यान देने की बात कही।

उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी उत्पादों के उपयोग, मातृभाषा में संवाद और पारंपरिक जीवनशैली को अपनाने पर भी जोर दिया। “पानी बचाओ, प्लास्टिक हटाओ, पेड़ लगाओ” जैसे संदेशों को घर से शुरू करने की अपील की।


आचरण में दिखे परिवर्तन

मोहन भागवत ने कहा कि समाज में परिवर्तन भाषणों से नहीं, बल्कि परिवार और व्यक्ति के आचरण से आता है। सप्ताह में एक दिन परिवार के सभी सदस्यों—बच्चों से लेकर बड़ों तक—को साथ बैठकर चर्चा करने और सहमति से व्यवहार में बदलाव लाने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा कि यदि कुटुंब मजबूत होगा, तो समाज और राष्ट्र भी मजबूत होंगे।

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